प्रो. लल्लन प्रसाद। आधारभूत संरचना (इन्फ्रास्ट्रक्चर) अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी होती है। इसका आकार-प्रकार, इसकी गुणवत्ता अर्थव्यवस्था की शक्ति का द्योतक होता है। जैसे टूटी-फूटी सड़कों पर चलने वाले वाहन तीव्र गति से नहीं चल सकते, अधिक ईंधन खपत करते हैं, गंतव्य स्थान पर समय से नहीं पहुंच पाते, रखरखाव के लिए अधिक खर्च मांगते हैं, उसी तरह कमजोर आधारभूत संरचना अर्थव्यवस्था को गति नहीं दे सकती।

देखा जाए तो आधारभूत संरचना के सूचकांक में भारत विश्व के प्रथम 10 देशों में शामिल नहीं है जिसमें आकार में बहुत छोटे देश सिंगापुर और हांगकांग व आर्थिक विकास की सीढ़ी पर बहुत आगे जर्मनी, फ्रांस, जापान और इंग्लैंड जैसे देश हैं। हालांकि इस मामले में भारत अभी 49वें पायदान पर है, यद्यपि संरचना के कई क्षेत्रों में पिछले सात वर्षो में जितना विकास हुआ है, उतना 70 वर्षो में नहीं हुआ।

उल्लेखनीय है कि लाजिस्टिक्स पर भारत में जीडीपी का 15 प्रतिशत तक खर्च आता है, जबकि विकसित देशों में यह पांच से 10 प्रतिशत तक है। भारत में जीडीपी का 35 प्रतिशत आधारभूत संरचना पर खर्च हो रहा है, किंतु यह भी कम है। इस संदर्भ में अगले 10 वर्षो में डेढ़ खरब डालर के खर्च का लक्ष्य है जो देश को पांच खरब डालर की अर्थव्यवस्था बना सके।

आज हमारे देश को आर्थिक विकास की राह पर तेजी से आगे ले जाने के लिए कृषि समेत अधिकांश उद्योगों और सेवाओं से संबंधित आधारभूत संरचनाओं को सुदृढ़ करना आवश्यक है। कृषि की पैदावार बढ़ाने, कल कारखानों में उत्पादन में तेजी लाने और सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए ठोस आधारभूत संरचना जैसे वर्षर्पयत सिंचाई के साधन, अच्छी सड़कें, रेलवे, जल यातायात, हवाई अड्डे, बंदरगाह, टेलीकम्युनिकेशन, नेटवर्किंग आदि की आवश्यकता होती है। स्टील, सीमेंट, आटो, आयल और गैस, माइनिंग और मेटलर्जी जैसे उद्योगों के विकास के लिए मजबूत आधारभूत संरचना आवश्यक है। भारतमाला, सागरमाला, उड़ान स्कीम, रेलवे का तेजी से विकास और नेटवर्किंग को गांवों तक ले जाने की व्यवस्था, अंतरराज्यीय जल यातायात को बढ़ाने की योजना समेत भारतनेट जैसी बड़ी आधारभूत योजनाएं चल रही हैं जिनका क्रियान्वयन निर्धारित समयसीमा में हो, इसके लिए ठोस कदम उठाने होंगे।

पिछले सात वर्षो में आधारभूत संरचना के विकास के लिए जो कदम उठाए गए हैं उनके सकारात्मक परिणाम मिल रहे हैं। प्राकृतिक गैस पाइपलाइन जो 1987 से बिछाई जा रही है, वर्ष 2014 तक मात्र 15 हजार किमी ही बिछाई गई थी। वर्ष 2014 के बाद 16 हजार किमी नई गैस पाइपलाइन पर काम चल रहा है। इसी तरह रेलवे लाइन के दोहरीकरण के प्रयास में भी तेजी आई है। साथ ही रेलवे के इलेक्टिफिकेशन के काम में भी तेजी आई।

इसी प्रकार मेट्रो रेल 2015 में मात्र 250 किमी थी जो अब 700 किमी तक हो गई है और एक हजार किमी की नई लाइनों पर काम चल रहा है। ग्राम पंचायतों को नेटवर्किंग से जोड़ने का काम काफी तेजी से हुआ है। वर्ष 2014 के पूर्व मात्र 600 ग्राम पंचायतों को आप्टिक फाइबर नेटवर्क से जोड़ा गया था, तब से अब तक डेढ़ लाख ग्राम पंचायतों को आप्टिक फाइबर नेटवर्क से जोड़ा जा चुका है। बंदरगाहों में जहाजों के टर्नआउट समय में भी कमी आई है। वर्ष 2014 में यह समय 41 घंटे था जो अब 27 घंटे हो गया है।

प्रधानमंत्री गतिशक्ति योजना के लागू होने से तमाम मंत्रलयों की विभिन्न योजनाओं से खर्च और उनके क्रियान्वयन समय में कमी आएगी और उनकी गुणवत्ता में वृद्धि होगी। वर्ष 2024-25 तक जिन आधारभूत योजनाओं को पूरा करने का लक्ष्य है उनमें प्रमुख हैं दो लाख रूट किमी के राष्ट्रीय राजमार्ग तैयार करना, गैस पाइप लाइन का का विस्तार, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में औद्योगिक गलियारे का निर्माण, देश के सभी गांवों में 4जी की सुविधा, अक्षय ऊर्जा की क्षमता वर्तमान के 87.7 गीगावाट से बढ़ाकर 225 गीगावाट करना, 220 नए एयरपोर्ट, हेलीपोर्ट व जल एरोड्रोम बनाना और रेलवे की कार्गो हैंडलिंग क्षमता 160 करोड़ टन करना।

भारत को विश्व व्यापार की राजधानी बनाने की दिशा में यह पहला कदम है जो वर्तमान सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति का भी परिचायक है। इच्छाशक्ति, दूरदर्शिता एवं ठोस कदम प्रगति के लिए आवश्यक हैं जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सत्ता संभालने के बाद से अब तक देखने को मिल रहा है। जीएसटी, एक देश एक बाजार, एक देश एक ग्रिड, एक राष्ट्र एक राशन कार्ड, जन धन योजना, गरीबों को मुफ्त रसोई गैस के कनेक्शन आदि साहसपूर्ण कदम हैं जो अर्थव्यवस्था को बल दे रहे हैं और भारत को विश्व पटल पर तेजी से ला रहे हैं।

गतिशक्ति योजना के क्रियान्वयन में चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सरकारी तंत्र, मंत्रलयों के अधिकारी और कर्मचारी जिस व्यवस्था के अंतर्गत और जिस गति से काम करते रहे हैं उसे बदलना थोड़े समय में आसान नहीं है, यद्यपि बदलाव आया है। अधिकांश बड़ी आधारभूत योजनाएं एक से अधिक राज्यों से संबद्ध होती हैं जिनमें राज्य सरकारों का सहयोग भी आवश्यक होता है, जैसे जमीन खरीदने, श्रमिकों की व्यवस्था, साधनों का आवंटन, ऊर्जा आपूर्ति, कानून व्यवस्था आदि। केंद्र और राज्यों में अलग अलग पार्टियों की सरकारों में कई बार मतैक्य नहीं हो पाता। आर्थिक दृष्टि से पिछड़े कुछ राज्यों में प्रोजेक्ट में लगे इंजीनियरों की हत्या, ठेकेदारों से जबरन वसूली, हड़ताल और बंद आदि प्रगति के रास्ते में रोड़े बनते हैं जिनसे प्रदेश का नुकसान तो होता ही है, योजना समय के अंदर और निर्धारित खर्चे में पूरी नहीं हो पाती। बहरहाल अगले वर्ष देश जब आजादी के 75 वर्ष पूरे होने पर उत्सव मनाएगा, आशा है कि तब तक देश की आधारभूत संरचना व्यापक रूप से विकसित होगी।

[पूर्व विभागाध्यक्ष, बिजनेस इकोनामिक्स विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय]