नई दिल्‍ली [जागरण स्‍पेशल]। 20 जुलाई 1969 का दिन पूरी दुनिया में खासा अहमियत रखता है। इसी दिन अमेरिका के एयरोनॉटिकल इंजीनियर और सेना के पायलट नील आर्मस्ट्रांग ने चांद पर कदम रखा था। उनके साथ चांद की धरती पर उतरने वालों में बज एल्ड्रिन भी थे। अपोलो 11 के साथ चांद की ओर रवाना होने वालों में इन दोनों के अलावा माइकल कॉलिन्स भी थे, जो चांद की सतह पर न उतरकर इसकी परिक्रमा कर रहे थे। अमेरिका आज तक इस मिशन को लेकर दुनियाभर से वाहवाही बटोरता आ रहा है। इस मिशन को अंतरिक्ष के रहस्‍यों को खोजने में सबसे बड़ा पड़ाव भी माना गया है। लेकिन, दूसरी तरफ इस मिशन को सवाल भी उठते रहे हैं। इन सवालों में इस मिशन को झूठा साबित करने की कोशिश भी की गई है। कहा जाता रहा है कि यह मिशन केवल रूस को नीचा दिखाने के मकसद से कहीं अंजान जगह पर फिल्‍माया गया था।इसको लेकर जो वजह बताई जाती रही हैं उसमें शीत युद्ध, वियतनाम युद्ध का भी जिक्र है, जिनमें अमेरिका को कुछ हासिल नहीं हुआ था।   

मिशन को लेकर क्‍या हैं दावे और सवाल
इस मिशन के बाद आलोचक यह कहते आए हैं कि अमेरिका ने यह सब एक स्‍टूडियो में किया था। सवाल ये भी उठे कि जिस तस्‍वीर में अमेरिका का झंडा चांद की सतह पर लगाया गया दिखाया है वह वहां पर लहरा रहा है, जबकि वहां पर कोई वायुमंडल नहीं है। ऐसे में इसका लहराना नामुमकिन है। इसके अलावा आर्मस्ट्रांग के पैरो के निशान भी सवालों के घेरे में हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि चांद पर ऐसा होना नामुमकिन है। कहा ये भी जाता रहा है कि जिस यान से आर्मस्‍ट्रांग चांद पर गए थे उसका वजन करीब 4 टन था, लेकिन उसने भी अपने निशान वहां पर नहीं छोड़े। ऐसे में आर्मस्‍ट्रांग के पांव के निशान अपने आप में सवाल खड़े करता है।

सवालों के घेरे में मिशन से जुड़ी तस्‍वीरें 
इस मिशन से जुड़ी तस्‍वीरों में चांद से तारों का न दिखाई देना भी सवाल खडे कर रहा है। वहीं सबसे ज्यादा हैरत में डालने वाली बात ये है कि इस ऐतिहासिक मिशन की मशीन के ब्लूप्रिंट्स आज तक किसी ने नहीं देखे। इस सवाल पर अमेरिका का कहना है कि वह गायब हो चुके हैं। इस मिशन से जुड़ी एक और तस्‍वीरों पर भी सवाल उठ रहे हैं। यह तस्‍वीर आर्मस्‍ट्रांग की है। लेकिन इसमें तस्‍वीर खींचने वाला इंसान दिखाई नहीं दे रहा है। जब उनके हेलमेट पर लगे शीशे में दूसरा अंतरिक्ष यात्री काफी दूर दिखाई दे रहा है। नासा का कहना है कि यदि तस्‍वीर दूसरे अंतरिक्ष यात्री के हेलमेट में लगे कैमरे से ली गई थी। वहीं एक सवाल ये भी है सूर्य से निकलने वाला रेडिएशन किसी भी इंसान को मार सकती है, फिर नासा इन सभी को सुरक्षित कैसे लेकर आया। 

ऐसे होगी अमेरिकी मिशन की जांच 
1969 में जब अमेरिका ने चांद पर मिशन भेजा था उसकी फुटेज से काफी कुछ हासिल हो सकता है। इसके अलावा आर्मस्‍ट्रांग के चांद पर मौजूद पांव के निशान इस मिशन की सारी कहानी को बयां करने के लिए काफी हैं। आपको बता दें कि चांद का अपना कोई वायुमंडल नहीं है। वहां पर न हवा है और न पानी। इसलिए यदि अमेरिका का मिशन सही होगा तो वहां पर वर्षों के बाद भी यह नील आर्मस्‍ट्रांग के पांव के निशान पहले की ही भांति मौजूद रहने चाहिए। इसके अलावा अमेरिका का झंडा जो वहां पर कोई वातावरण न होने के बावजूद लहरा रहा था, भी होना चाहिए। आपको यहां पर ये भी बता दें कि इस मिशन के बाद कहा गया था कि आर्मस्‍ट्रांग अपने साथ वहां से चांद की धूल भी लेकर आए थे। इस नमूने का असली से मिलान करने पर भी कई राज खोले जा सकते हैं।

झूठी साबित हो गई अमेरिकी थ्‍योरी तो क्‍या होगा 
रूस की तरफ से पिछले वर्ष कहा गया था कि वह अमेरिका के मून मिशन का पता लगाने के लिए चांद पर अपना मिशन भेजेगा। रूस की रोस्कोसमोस अंतरिक्ष एजेंसी के प्रमुख दिमित्री रोगोजिन के मुताबिक उनका एक मिशन भेजेगा। रूस इन सवालों के जवाब तलाशने को लेकर उत्‍साहित है। इस मिशन का काम यह पता लगाना है कि क्‍या वास्‍तव में अपोलो 11 चांद की सतह पर उतरा था या‍ फिर यह केवल एक नाटक था जो अमेरिका ने रूस से बदला लेने और पूरी दुनिया में अपना वर्चस्‍व कायम करने के लिए रचा था। इसको लेकर दिमित्री रोगोजिन ने कुछ समय पहले एक ट्वीट भी किया था। दरअसल अमेरिका का यह मिशन शुरू से ही रहस्‍य और सवालों में घेरे में रहा है। इस मिशन को लेकर लोगों की भी अलग-अलग राय है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि रूस ने इस मिशन को गलत या झूठा साबित कर दिया तो क्‍या होगा। ऐसे में अमेरिका की साख को बट्टा लगने से लेकर चांद को लेकर कई तरह की थ्‍योरी भी झूठी साबित हो सकती हैं।

अपने स्‍पेस मिशन में रूस की मदद लेता है अमेरिका  
आपको यहां पर ये भी बता दें कि रूस और अमेरिका के बीच वर्षों से एक प्रतियोगिता चली आ रही है। यह अपने को एक कदम आगे दिखाने की प्रतियोगिता है। जहां तक अंतरिक्ष कार्यक्रम की बात है तो इसमें रूस का वर्चस्‍व पहले भी था और आज भी है। रूस ने ही पहली बार यूरी गागरिन के रूप में किसी मानव को धरती के पार अंतरिक्ष में भेजा था। उसने ही पहली बार धरती से बाहर जानवरों को भेजा था। अंतरिक्ष मिशन में उसका कोई सानी पहले भी नहीं था और आज भी नहीं है। इस बात का एक सुबूत ये भी है कि वर्तमान में अमेरिका अपने अंतरिक्ष मिशन के लिए रूस की मदद ले रहा है।

अंतरिक्ष में रूस ने अमेरिका को पीछे छोड़ा 
दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब सोवियत संघ अंतरिक्ष में जाने की तैयारी करने लगा तो अमेरिका आसमान की बुलंदियों में उससे पिछड़ने लगा था। ऐसे में राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी ने 1961 में तय किया कि अमेरिकी विज्ञानी चांद पर पहुंचेंगे। लेकिन, एक के बाद एक मिशन में अमेरिका उसके कहीं पीछे रह गया। जहां तक रूस के अंतरिक्ष कार्यक्रम की बात है तो उसके मिशन इस क्षेत्र में मील का पत्‍थर साबित हुए। अंतरिक्ष में जाने वाले पहले पुरुष से लेकर पहली महिला तक रूस की ही थी। सोवियत संघ ने 1970 के दशक के मध्य में अपने चंद्र कार्यक्रम को छोड़ दिया था क्योंकि चांद पर भेजे जाने वाले चार प्रयोगात्मक रॉकेटों में विस्फोट हो गया था।

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Posted By: Kamal Verma